SIYAHI KI SADA
SIYAHI KI SADA सर्दियों की स्याह रात थी। हवाएं मानो किसी अनसुने राग को गुनगुना रही थीं। पेड़ों के सूखे पत्ते ज़मीन पर बिखरे हुए किसी पुरानी याद की तरह सिसक रहे थे। खिड़की के शीशों पर जमी ओस की बूंदें बाहर पसरे अंधकार को और भी गहरा बना रही थीं। कमरे के अंदर, एक…